Monday, 13 August 2012
chah
चाह
मानुष हो तो वहै प्रभुजी ,
उन मंत्री महोदय भामिनी भ्राता l
जो पशु हो तो सुतो नितही ,
भरि अंक सुकोमल कामिनी गाता l
जो खग हो तो अटूट रहे ,
उन बातानुकुलित कक्ष से नाता l
पाहन नाहि उपाहन होऊ ,
सदा झुकाते जिस पे जन माथा l l
मानुष हो तो वहै प्रभुजी ,
उन मंत्री महोदय भामिनी भ्राता l
जो पशु हो तो सुतो नितही ,
भरि अंक सुकोमल कामिनी गाता l
जो खग हो तो अटूट रहे ,
उन बातानुकुलित कक्ष से नाता l
पाहन नाहि उपाहन होऊ ,
सदा झुकाते जिस पे जन माथा l l
Saturday, 14 July 2012
AZADI KE PACHAS VARSH
आज़ादी के पचास वर्ष
पुरुष -सुन रे सजनी आज़ादी के बीते वर्ष पचास l
चारो तरफ बिखरी है खुशिया , लेकर नूतन हास l l
बीत गई पावस की राका , अब आओ मधुमास l
निर्धानता हो गई अपाहिज ,लक्ष्मी करे निवास l
स्त्री - माना बीत गए मेरे प्रियतम , आज़ादी के वर्ष पचास l
पर मुझको तो नजर न आये ,कोई परिवर्तन खास l
वही है चूल्हा चौका अपना , उन्ही चरणों की दास l l
अपनी तो जैसे थी पावस , वैसी ही मधुमास l
पुरुष -कूप माण्डुक की करती बाते , देखो आंखे खोल l
नर-नारी का अन्तेर मिट गया ,करे पुरुष से होड़ l
कोई ऐसा क्षेत्र नहीं ,जो नारी पहुच परे हों l
पहुच गई कल्पना वहा ,जह मानव पग न धरे हो l
स्त्री - माना आर्थिक प्रगति हुई है ,औ उधोग बदे है l
कांच की चूड़ी के बदले , अब सोने के कड़े है l
पर बदली न सोंच तुम्हारी , वही भाव सड़े है l
पुरुष - कल तक तू थी बंद महल में ,आज आज़ादी पाई हो l
यह तो हमारी कृपा है रानी , हम से गौरव पाई हो l
स्त्री - सलाह , मशविरा , परामर्श , तू माने नही हमारी हो l
नारी को अछूत समझते ,मानो कोई वीमारी हो l
पुरुष - किस समाज औ किस कुटुम्ब में , नारी का स्थान नहीं l
नारी का अपमन हुआ तो , राष्ट्र का सम्मान नहीं l
स्त्री -पुरुष - हम दोनों जीवन रथ के ,दो पहिये स्वस्र्ह्या सुघर है l
निज देश सदा सुरभित , शोभित ,आज़ादी अजर ,अमर है l
समाप्त
पुरुष -सुन रे सजनी आज़ादी के बीते वर्ष पचास l
चारो तरफ बिखरी है खुशिया , लेकर नूतन हास l l
बीत गई पावस की राका , अब आओ मधुमास l
निर्धानता हो गई अपाहिज ,लक्ष्मी करे निवास l
स्त्री - माना बीत गए मेरे प्रियतम , आज़ादी के वर्ष पचास l
पर मुझको तो नजर न आये ,कोई परिवर्तन खास l
वही है चूल्हा चौका अपना , उन्ही चरणों की दास l l
अपनी तो जैसे थी पावस , वैसी ही मधुमास l
पुरुष -कूप माण्डुक की करती बाते , देखो आंखे खोल l
नर-नारी का अन्तेर मिट गया ,करे पुरुष से होड़ l
कोई ऐसा क्षेत्र नहीं ,जो नारी पहुच परे हों l
पहुच गई कल्पना वहा ,जह मानव पग न धरे हो l
स्त्री - माना आर्थिक प्रगति हुई है ,औ उधोग बदे है l
कांच की चूड़ी के बदले , अब सोने के कड़े है l
पर बदली न सोंच तुम्हारी , वही भाव सड़े है l
पुरुष - कल तक तू थी बंद महल में ,आज आज़ादी पाई हो l
यह तो हमारी कृपा है रानी , हम से गौरव पाई हो l
स्त्री - सलाह , मशविरा , परामर्श , तू माने नही हमारी हो l
नारी को अछूत समझते ,मानो कोई वीमारी हो l
पुरुष - किस समाज औ किस कुटुम्ब में , नारी का स्थान नहीं l
नारी का अपमन हुआ तो , राष्ट्र का सम्मान नहीं l
स्त्री -पुरुष - हम दोनों जीवन रथ के ,दो पहिये स्वस्र्ह्या सुघर है l
निज देश सदा सुरभित , शोभित ,आज़ादी अजर ,अमर है l
समाप्त
SHABD
शब्द
शब्द मधुर औ स्नेहयुक्त हो ,
ग्लानि , भय ,छल , कपट
ईर्ष्या , निंदा का न ओदे पट ,
दम्भ ,द्वेष , अभिमान रहित हो l शब्द मधुर ओं ---------
भ्रम का समावेश न हो ,
गुमराही का सन्देश न हो ,
मार्गो का उचित दर्शन हो ,
मान न किसी का मर्दन हो ,
कटुता औ वैमनष्यता से
सब भाति ,रहित औ मुक्त हो l शबद मधुर औ ----------
शब्द शोर नहीं
न जाने नृत्य ,
वह मोर नहीं ,
बिनु , उषा आये भोर नहीं l
संस्कृति एवम सभ्यता से सर्वदा संयुक्त हों l शब्द मधुर औ -------
शब्द भाव मापक है ,
भाषा का मानक है ,
व्यक्तित्व परिचायक है ,
नाविक का शायक है ,
हृदय के भावो को करता नित व्यक्त हो l शब्द मधुर औ -----------
शब्द ही अज्ञान तिमिर को हटाता है ,
भाव कुञ्ज कलिका को ,
शब्द ही चटकाता है ,
शब्द ही मानव को ,
देवता बनाता है l
अशुभ वेशधारी शिव को ,
महादेव बनाता है l
काक पिक का अन्तेर तो शब्द से अभिव्यक्त है l
शब्द मधुर ओं स्नेह युक्त हो l
शब्द मधुर औ स्नेहयुक्त हो ,
ग्लानि , भय ,छल , कपट
ईर्ष्या , निंदा का न ओदे पट ,
दम्भ ,द्वेष , अभिमान रहित हो l शब्द मधुर ओं ---------
भ्रम का समावेश न हो ,
गुमराही का सन्देश न हो ,
मार्गो का उचित दर्शन हो ,
मान न किसी का मर्दन हो ,
कटुता औ वैमनष्यता से
सब भाति ,रहित औ मुक्त हो l शबद मधुर औ ----------
शब्द शोर नहीं
न जाने नृत्य ,
वह मोर नहीं ,
बिनु , उषा आये भोर नहीं l
संस्कृति एवम सभ्यता से सर्वदा संयुक्त हों l शब्द मधुर औ -------
शब्द भाव मापक है ,
भाषा का मानक है ,
व्यक्तित्व परिचायक है ,
नाविक का शायक है ,
हृदय के भावो को करता नित व्यक्त हो l शब्द मधुर औ -----------
शब्द ही अज्ञान तिमिर को हटाता है ,
भाव कुञ्ज कलिका को ,
शब्द ही चटकाता है ,
शब्द ही मानव को ,
देवता बनाता है l
अशुभ वेशधारी शिव को ,
महादेव बनाता है l
काक पिक का अन्तेर तो शब्द से अभिव्यक्त है l
शब्द मधुर ओं स्नेह युक्त हो l
Monday, 9 July 2012
prajatantra
प्रजातंत्र
प्रजातंत्र में ,
वाणी की स्वतंत्रता के नाम पार ,
कीचड़ उछालते है lपरनिंदा में प्रवीण ब्यक्ति ,
कुशल वक्ता कहलाता है l
देश का अधिक से अधिक ,
दोहन कर सके l
विकास के नाम पर ,
जेबे भर सके ,
नित्य नए घोटालो का ,
जो है प्रणेता ,
प्रजातंत्र में माना जाता ,
एक सच्चा नेता l
वास्तव में , प्रजातंत्र में ,
मनमानी करने की है छुट l
लूट मची है लूट l
सहनशीलता रोती है l
उग्रता के सामने ,
शीतलता सोती है l
प्रजातन्त्र में ,
जब जो चाहे , लेलेता है पंगा ,
जिसका जी चाहे धो लेता है हाथ ,
प्रजातंत्र तो है ,
एक बहती हुई गंगा l l
HINDI PAKHWADA
हिंदी है अपनी भाषा , इसकी शान बढाएंगे ,
सब भाषाए बहने इसकी ,
इसका मl न बदयेंगे l
तन में हिंदी , मन में हिंदी ,
और ह्रदय में है हिंदी l
उच्च हिमालय , सागर तल में ,
रोम रोम में है हिंदी l l
गीत
आओ , आओ सब मिलि आओ ,
हिंदी दिवस मनाओ रे l
हिंदी है जन -जान की भाषा ,
इसको गले लगाओ रे l
हिंदी है गंगा जैसी ,
सारी भाषाए मिलाती ,
हिंदी से गौरव पाये ,
सूर ,रहीम ,मीरा ,तुलसी l
भूषण भाव ह्रदय में भर कार ,--आ -आ
मानस डूबकी लगाओ रे l ओओ आओ
प्रेमचंद की पड लो कहानी ,
जायसी की पद्मावती रानी ,
आचल दूध आ आंख में पानी ,
गुप्त की तुम सुन लो जुबानी l
कामायनी क सर्ग तार से , आ आ आ
निज परिधान बनाओ रे l अओ आओ आओ
हिन्द की पहचान है हिंदी ,
मीरा की अरमान है हिंदी ,
खुसरो औ रसखान है हिन्दी ,
सारा हिन्दूस्तान है हिन्दी ,
काका की मुस्कान है हिन्दी l
दिनकर , देव ,विहारी के , आ या आ
काव्यो को कंठ लगाओ रे l आओ ,आओ आओ
हिन्दुस्तान बना हिन्दी से ,
हम सब हिंद के वासी है l
नानक औ कबीर की भाषा ,
जयशंकर की काशी है l
आदिकाल के चंद की भाषा ,
भक्तिकाल के सूर की भाषा ,
रितिकालिक श्रीन्गारिक आशा l
पन्त ,निराला की अभिलाषा ,
हिन्दी है हिंडोला अपनी , आ आ आ
झूमो , नाचो , गाओ रे l l आओ आओ आओ
समाप्त
सब भाषाए बहने इसकी ,
इसका मl न बदयेंगे l
तन में हिंदी , मन में हिंदी ,
और ह्रदय में है हिंदी l
उच्च हिमालय , सागर तल में ,
रोम रोम में है हिंदी l l
गीत
आओ , आओ सब मिलि आओ ,
हिंदी दिवस मनाओ रे l
हिंदी है जन -जान की भाषा ,
इसको गले लगाओ रे l
हिंदी है गंगा जैसी ,
सारी भाषाए मिलाती ,
हिंदी से गौरव पाये ,
सूर ,रहीम ,मीरा ,तुलसी l
भूषण भाव ह्रदय में भर कार ,--आ -आ
मानस डूबकी लगाओ रे l ओओ आओ
प्रेमचंद की पड लो कहानी ,
जायसी की पद्मावती रानी ,
आचल दूध आ आंख में पानी ,
गुप्त की तुम सुन लो जुबानी l
कामायनी क सर्ग तार से , आ आ आ
निज परिधान बनाओ रे l अओ आओ आओ
हिन्द की पहचान है हिंदी ,
मीरा की अरमान है हिंदी ,
खुसरो औ रसखान है हिन्दी ,
सारा हिन्दूस्तान है हिन्दी ,
काका की मुस्कान है हिन्दी l
दिनकर , देव ,विहारी के , आ या आ
काव्यो को कंठ लगाओ रे l आओ ,आओ आओ
हिन्दुस्तान बना हिन्दी से ,
हम सब हिंद के वासी है l
नानक औ कबीर की भाषा ,
जयशंकर की काशी है l
आदिकाल के चंद की भाषा ,
भक्तिकाल के सूर की भाषा ,
रितिकालिक श्रीन्गारिक आशा l
पन्त ,निराला की अभिलाषा ,
हिन्दी है हिंडोला अपनी , आ आ आ
झूमो , नाचो , गाओ रे l l आओ आओ आओ
समाप्त
Saturday, 7 July 2012
maleria unmulan divas
मलेरिया उन्मूलन दिवस
मछर राज - बचाइए , बचाइए , बचाइए
महाराज l
विधाता -क्या हुआ , मछर राज l
मछर राज - हे विधाता , हे अन्नदाता ,
वर्णन न कर सके ,
ऐसा है कष्ट ,
हो रहे हम समूल नष्ट l
विधाता - क्या हुआ वत्स , विस्तार से बताओ ,
अपने कष्टों का कारण समझाओ l
मच्छर राज -डा . रौस की वुद्धि गई थी मारी l
पता लगाया जिसने मलेरिया एक वीमारी l l
हम मानव का थोडा खून पीते थे ,
उन्ही के सहारे खुद भी जी लेते थे l
विधाता - अब क्या हुआ ?
मच्छर राज - क्या नहीं हुआ ,
यह पूछिये चतुरानन l
भवन छोड़ , अपना तो ,
घर बना कानन l
रोज चलता है , सफाई अभियान ,
कमर कास ली मानव ने ,
मिटाने को अपना नामोनिशान l
कल तक नालियों में ,
अपना निवास था l
फल -फुल रहे थे हम ,
ख़ुशी आस -पास था l
कर के सफ़ाई ,
कर दिया निज सफा l
जब भी बीमारी कोई होती है नया l
बार -बार हमे ही कोसे है l
पर सच बा एह है l
मानव ही मानव का ,
रक्त चूसते है l
विधाता - बंद करो बकवास ,l
रहने दो अपना पुराना इतिहास l
मेरी रचना का सर्वोतम उपहार l
मानव का करते हो ,तुम त्त्रिस्कार l
मछार राज - आप तो जानते है ,
हमारा और मानव का ,
छत्तीस का अकड़ा l
अब तो उनको भी ढुक देते है ,
जो है गला -सडा l
हमको सदा समझते है कमजोर ,
फिर भी डरते है l
मछरदानी में सोते है l
पूरी आस्तीन का वस्त्र पहनते है l
ओडोमास ,गुदनैत अपनाते है l
विधाता - मादा मछार इन्फ्लिस का ,क्या हाल है l
उसके मुह तो सदा ,
रकत से रहते लाल -लाल है l
मछर राज - मादा इन्फ्लिस ,
कोमल कमनीय ,
उसकी तो दसा और दयनीय l
अपार कष्ट , उसकी तो प्रजाति ही ,
हो रही समूल नष्ट l
नालिय्यो में डीडी टी , मिटटी का तेल ,
नीम का तेल , सदा डालते है l
नीम के पतियों का धुआ ,
तालाबो में मछली पालते है l
विश्व के गिने -चुने में ,अपना निवास था l
नाली छोड़ ,कूलरो में ,अपना आवास था l
डेंगू का भय मन , सफाई पर अड़े है l
हाथ धो कर हमारे पीछे पड़े है l
हे सृष्टि के रचयिता विधाता श्रीमंत l
आपकी रचना का हो रहा है अंत l
मिर्तुलोक में अब तो है शोक ही शोक l
विधाता - म्र्त्युलोक छोड़ दो ,l
आ जाओ स्वर्गलोक l l
समाप्त
मछर राज - बचाइए , बचाइए , बचाइए
महाराज l
विधाता -क्या हुआ , मछर राज l
मछर राज - हे विधाता , हे अन्नदाता ,
वर्णन न कर सके ,
ऐसा है कष्ट ,
हो रहे हम समूल नष्ट l
विधाता - क्या हुआ वत्स , विस्तार से बताओ ,
अपने कष्टों का कारण समझाओ l
मच्छर राज -डा . रौस की वुद्धि गई थी मारी l
पता लगाया जिसने मलेरिया एक वीमारी l l
हम मानव का थोडा खून पीते थे ,
उन्ही के सहारे खुद भी जी लेते थे l
विधाता - अब क्या हुआ ?
मच्छर राज - क्या नहीं हुआ ,
यह पूछिये चतुरानन l
भवन छोड़ , अपना तो ,
घर बना कानन l
रोज चलता है , सफाई अभियान ,
कमर कास ली मानव ने ,
मिटाने को अपना नामोनिशान l
कल तक नालियों में ,
अपना निवास था l
फल -फुल रहे थे हम ,
ख़ुशी आस -पास था l
कर के सफ़ाई ,
कर दिया निज सफा l
जब भी बीमारी कोई होती है नया l
बार -बार हमे ही कोसे है l
पर सच बा एह है l
मानव ही मानव का ,
रक्त चूसते है l
विधाता - बंद करो बकवास ,l
रहने दो अपना पुराना इतिहास l
मेरी रचना का सर्वोतम उपहार l
मानव का करते हो ,तुम त्त्रिस्कार l
मछार राज - आप तो जानते है ,
हमारा और मानव का ,
छत्तीस का अकड़ा l
अब तो उनको भी ढुक देते है ,
जो है गला -सडा l
हमको सदा समझते है कमजोर ,
फिर भी डरते है l
मछरदानी में सोते है l
पूरी आस्तीन का वस्त्र पहनते है l
ओडोमास ,गुदनैत अपनाते है l
विधाता - मादा मछार इन्फ्लिस का ,क्या हाल है l
उसके मुह तो सदा ,
रकत से रहते लाल -लाल है l
मछर राज - मादा इन्फ्लिस ,
कोमल कमनीय ,
उसकी तो दसा और दयनीय l
अपार कष्ट , उसकी तो प्रजाति ही ,
हो रही समूल नष्ट l
नालिय्यो में डीडी टी , मिटटी का तेल ,
नीम का तेल , सदा डालते है l
नीम के पतियों का धुआ ,
तालाबो में मछली पालते है l
विश्व के गिने -चुने में ,अपना निवास था l
नाली छोड़ ,कूलरो में ,अपना आवास था l
डेंगू का भय मन , सफाई पर अड़े है l
हाथ धो कर हमारे पीछे पड़े है l
हे सृष्टि के रचयिता विधाता श्रीमंत l
आपकी रचना का हो रहा है अंत l
मिर्तुलोक में अब तो है शोक ही शोक l
विधाता - म्र्त्युलोक छोड़ दो ,l
आ जाओ स्वर्गलोक l l
समाप्त
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